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उद्धव गुट के लिए नई चुनौती, सांसदों के बाद अब दफ्तर पर भी संकट के बादल

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मुंबई 
लोकसभा सांसदों की बगावत के झटके से उबर रही शिवसेना (यूबीटी) की मुश्किलें कम होती नहीं दिख रहीं. पार्टी को अब संसद में एक और बड़ा नुकसान उठाना पड़ सकता है. पार्टी के 6 सांसदों के शिवसेना (शिंदे) में विलय के बाद न सिर्फ उसकी संसदीय ताकत घटेगी, बल्कि संसद भवन परिसर में मिले उसके दफ्तर पर भी संकट के बादल मंडराने लगे हैं। 

सूत्रों के मुताबिक, इस मामले में लोकसभा अध्यक्ष की औपचारिक मंजूरी मिलने के बाद शिवसेना (यूबीटी) के संसदीय दल में सिर्फ चार सांसद ही बाकी रह जाएंगे।  

संसद के नियम के तहत आमतौर पर पांच या उससे ज्यादा सांसदों वाले दलों को ही संसद भवन परिसर में अलग दफ्तर आवंटित किया जाता है. ऐसे में पार्टी को अपने वर्तमान कार्यालय से हाथ धोना पड़ सकता है। 

संसदीय गतिविधियों में पार्टी की भागीदारी पर पड़ सकता है असर
सांसदों की संख्या घटने का असर राजनीतिक और संसदीय गतिविधियों में पार्टी की भागीदारी पर भी पड़ सकता है. अहम राष्ट्रीय और संसदीय मुद्दों पर केंद्र सरकार की ओर से बुलाई जाने वाली सर्वदलीय बैठकों में आमतौर पर पांच से कम सांसदों वाले दलों को आमंत्रित नहीं किया जाता है. ऐसे में भविष्य में शिवसेना (यूबीटी) की इन बैठकों में मौजूदगी पर भी सवाल खड़े हो सकते हैं। 
फिलहाल शिवसेना (यूबीटी) के संसदीय दल का दफ्तर संविधान सदन (पुराना संसद भवन) के कमरा नंबर 128A में स्थित है. ये दफ्तर अविभाजित शिवसेना को आवंटित कमरे नंबर 128 के ठीक बगल में है. सांसदों की संख्या में संभावित कमी के बाद इस कार्यालय के आवंटन की स्थिति पर भी नजरें टिकी हुई हैं। 

महाराष्ट्र की राजनीति में ‘ऑपरेशन टाइगर’ की चर्चा
पिछले कई दिनों से महाराष्ट्र की राजनीति में ‘ऑपरेशन टाइगर’ खूब चर्चा में हैं. इस दलबदल को एकनाथ शिंदे का ‘ऑपरेशन टाइगर’ कहा जा रहा है. शिवसेना पर आए इस संकट को राज्यसभा सांसद संजय राउत सुलझाने की कोशिश कर रहे हैं. संजय राउत दिल्ली में हैं. वहीं पार्टी के सांसद अरविंद सावंत, अनिल देसाई भी दिल्ली में ही ठहरे हुए हैं.  बताया जा रहा है कि संजय राउत दलबदल को रोकने के लिए किताबों और संसदीय प्रक्रिया का अध्यन करने में लगे हैं। 

संजय राउत और अनिल देसाई ने दिल्ली के प्रमुख वकीलों के साथ इस बात पर बातचीत की कि अगर छह सांसद बेहतर अवसरों की तलाश में अगर पार्टी बदल लेते हैं तो उसमें क्या कानूनी उपाय किए जाने चाहिए. इसको लेकर अनिल परब ने बताया कि अगर सुप्रीम कोर्ट यूबीटी और शिंदे गुट के धनुष-बाण चिन्ह वाले फैसले पर सुनवाई की होती तो हमारा पक्ष मजबूत होता। 

शिवसेना संकट पर क्या बोले एक्सपर्ट्स?
इस बीच एक्सपर्ट्स का कहना है कि ठाकरे के लिए इस संकट से निपटना चुनौती भरा हो सकता है, जिसे देश की राजनीति के तेजी से बदलते स्वरूप के रूप में देखा जाना चाहिए. लेखक और शिवसेना के इतिहासकार प्रकाश अकोलकर यह सब पैसे का खेल है. कोई भी पार्टी बीजेपी के पैस और संसाधनों का सामना नहीं कर सकती. सांसद से लेकर विधायक तक बिकने को तैयार हैं. बीजेपी जो ऐसा कर रही है यह बेहद शर्मनाक है। 

उन्होंने कहा कि 20 से 25 साल के युवाओं की सिर्फ यही राय है कि उद्धव ठाकरे को बीजेपी का डटकर सामना करना चाहिए. एक कार्यकर्ता ने कहा कि अब समय आ गया है कोई बीजेपी के सामने खड़ा हो और देश में विपक्षी पार्टियों को खत्म करने की नापाक साजिश को पर्दाफाश करे। 

वहीं दूसरी तरफ कई शिवसैनिक ‘ऑपरेशन टाइगर के विरोध के लिए सड़कों पर उतरने के लिए भी तैयार हैं.’ बता दें कि पार्टी बदलने वाले 6 सांसदों में संजय दीना पाटिल ने पहले कहा था कि उनकी गठबंधन में जाने की मर्जी नहीं है। 



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